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दौड़ती हुई खबरे
जन्म देने वाले माता पिता का आशीर्वाद
ईश्वर का आशीर्वाद होता है।
एशिया का सबसे बड़ा ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर पवई में बनेगा।
महालक्ष्मी में बनेगा भारत का सबसे बड़ा सेंट्रल पार्क।
कुत्तों का आतंक।
फर्जी पुलिस बनकर ठगा 1 करोड़ रुपए।
संपादकीय - नकाब हटाना गुनाह? घूंघट होता तो।
लेख - आस्था गई, अधिकार गए।
माता पिता की पुण्याई से जन्मदिन पर मिला
ॐ नमः शिवाय की सौगात।
जन्म देने वाले माता-पिता का
आशीर्वाद ही ईश्वर का आशीर्वाद होता है
मुंबई : अमूमन लोग अपना जन्मदिन हॉटल, पब, क्लब या ऐसी जगहों पर मनाते हैं, जहां पर खूब सारा डिस्को डांस और रंगरेलियों की मौज-मस्ती हो किंतु मैं अपना जन्मदिन अपने माता-पिता के उसूलों पर उन मूल्यों को महत्व देता हूं, जहां से हमारी आस्था को जीवन के आयाम मिलते हैं. इसी कड़ी में हमने अपने पूज्य माता और आदरणीय पिताजी को देवों के देव महादेव की प्रथम ज्योर्तिलिंग सोमनाथ मंदिर, वहां से पूरी द्वारिका पुरी, फिर नागेश्वर ज्योर्तिलिंग की धार्मिक यात्रा उपरांत काशी की बाबा विश्वनाथ ज्योर्तिलिंग और वाराणसी में सभी देवतीर्थ दर्शन करने के बाद अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ दर्शन उपरांत इस बार हमने अपने मम्मी-पापा को इस वर्ष जन्मदिन पर उज्जैन स्थित महाकालेश्वर, माता हरसिद्धि दर्शन के बाद उज्जैन से खंडवा जिले के ओंकारेश्वर में प्रभु ओंकारेश्वर, ममलेश्वर और दोनों स्थानों पर कल-कल प्रवाहित करती सरिता शिप्रा और नर्मदा नदी दर्शन संग आरती का सौभाग्य प्राप्त किया. मुंबई में हम छत्रपति शिवाजी टर्मिनस से वायुयान द्वारा इंदौर स्थित पुण्यश्लोका माता अहिल्याबाई होल्कर एअरपोर्ट पहुंचे फिर टैक्सी से उज्जैन में मिलन हॉलीडे हॉटल से फ्रेश होकर शिप्रा नदी के राम घाट पर संध्या आरती उपरांत संपूर्ण महाकाल लोक कॉरीडोर में प्रभु शिव के विभिन्न स्वरुपों का दर्शन कर वहीं पर डिनर बाद अपने हॉटल आ गए. अल्प विराम उपरांत प्रभु महाकालेश्वर दर्शन के लिए रात १२ बजे लाइन में लगने के बाद प्रातः ४ बजे गर्भ गृह में महाकालेश्वर विग्रह की भस्म आरती और प्रसाद ग्रहण कर परिसर में स्थापित कई मंदिरों का दर्शन कर पुनः हॉटल आ गए. महाकालेश्वर इतिहास १२ ज्योर्तिलिंगों में से एक शिप्रा नदी तट पर स्थित इस मंदिर में महाकालिश स्वयंभू और दक्षिणमुखी शिवलिंग, वराह पुराण के
अनुसार इस मंदिर के शिखर के ठीक ऊपर कर्क रेखा गुजरती है. इसलिए इसे पृथ्वी का नाभिस्थल माना जाता है. भगवान शिव को जगाने के लिए इस मंदिर में भस्म आरती प्रतिदिन सुबह ४ बजे शुरु होती है. यहां पर महाकाल कॉरीडोर प्राचीन रुद्रसागर झील से घिरा हुआ है. इसमें आपको १०८ स्तंभ, करीब २०० मूर्तियां और शिव कथा को दर्शाने वाले भित्ति चित्र, मूर्तियां, फव्वारे
और पार्क रंग-बिरंगी रोशनी से सजे हैं. यहां पर भारत माता मंदिर में प्रतिदिन रात ८ बजे वंदे मातरम गाया जाता है. मान्यता है कि उज्जयिनी का एक ही राजा है और वे हैं भूतभावन महाकालेश्वर. यही वजह है कि पुराने समय से ही कोई राजा उज्जैन में रात्रि विश्राम नहीं करता और ना ही राजा की तरह दर्शन करता है. इस मंदिर परिसर में एक विशाल कुंड यानी कोटितीर्थ और कई देवी-देवताओं के मंदिर भी हैं. ५१ शक्तिपीठों में हरसिद्धि मंदिर इस मंदिर को राजा विक्रमादित्य की तपोभूमि और परमारवंशीय राजाओं की कुलदेवी माना जाता है. यहां माता सती के हाथ की कोहनी गिरने से यह स्थान शक्तिपीठ बना. माता की भक्ति प्राप्त करने के लिए स्वयं राजा विक्रमादित्य ने प्रत्येक १२ वर्ष में अपने सिर को काटकर बलि दी थी. ११ बार बलि देने पर उनका सर वापस आ गया किंतु १२वीं बार जब सिर वापस नहीं आया तो राजा विक्रमादित्य के शासन को पूर्ण मान लिया गया. यहां पर प्रतिदिन भक्तों की मदद से ५१ फीट ऊंची दीप स्तंभ पर ११०१ दीप प्रज्वलित किये जाते हैं. इन दोनों दीप स्तंभों को एक बार प्रजवलित करने में करीब ४ किलो रुई की बाती और ६० लीटर तेल लगता है. क्षिप्रा नदी मां क्षिप्रा नदी के तट पर जब महाकाल महाराज अपने लाव लश्कर के साथ पहुंचते हैं तो क्षिप्रा प्रसन्न होकर उनके पांव पखारती है. रघुवंश में महाकवि कालिदास ने क्षिप्र की वायु का मनोहर वर्णन किया है. क्षिप्रा नदी अपने गोपनीय द्वार से आकर भगवान महाकालेश्वर का युगों से अभिषेक कर रही है. कहा जाता है कि एक बार राजा महाकालेश्वर को भूख लगी तो भिक्षा मांगने का निश्चय किया किंतु जब भिक्षा नहीं मिली तो उन्होंने विष्णु से भिक्षा चाही. विष्णु ने उन्हें अपनी तर्जनी दिखा दी तो क्रोधित होकर शिव ने उस तर्जनी को त्रिशूल से भेद दिया. उस उंगली से रक्त प्रवाहित होने लगी, तब महाकालेश्वर ने उसके नीचे कपाल कमंडल रख दिया. कपाल के भर जाने पर वह नीचे प्रवाहित होने लगी, उसी से क्षिप्रा जन्मी.
ओंकारेश्वर यात्रा
महाकाल लोक से प्रातः ९ बजे हम टैक्सी से ओंकारेश्वर जा रहे थे कि रास्ते में बहुत विशाल शनिदेव मंदिर का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. यहां पर नवग्रहों की पूजा करने के बाद हम शाम ४ बजे ओंकारेश्वर पहुंचे. यहां पर माता नर्मदा नदी विहार उपरांत ओंकारेश्वर मंदिर जो मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में नर्मदा नदी के बीच मन्धाता या शिवपुरी नामक द्वीप पर दो स्वरुप में मौजूद है. इसमें एक को ममलेश्वर और दूसरे को ओंकारेश्वर नाम से जाना जाता है. शास्त्रों के अनुसार एक बार नारायण भक्त नारद मुनि विंध्याचल से खुद का गुणगान सुनकर अहंकार भंजन हेतु मेरु पर्वत की व्याख्या की तो व्यथित विंध्याचल शिव की आरधना से अभीष्ट बुद्धि प्राप्त किए. उसी समय देवता और ऋषिगणों ने महादेव से प्रार्थना किया तो शिव ज्योर्तिलिंग दो स्वरुपों में विभक्त हो गया. जिसमें से एक प्रणव लिंग ओंकारेश्वर और दूसरा पार्थिव लिंग ममलेश्वर ज्योर्तिलिंग नाम से प्रसिद्ध हुआ. नर्मदा नदी के मध्य ओंकार पर्वत पर स्थित ओमकारेश्वर ज्योर्तिलिंग एक द्वीप के रुप में अत्यंत ही पवित्र व सिद्ध स्थान है. ओंकारेश्वर से दूसरे दिन हम टैक्सी से पुण्य श्लोका माता अहिलाबाई होल्कर एयरपोर्ट इंदौर पहुंचकर वायुयान द्वारा शाम मुंबई लौट आए, किंतु यह दिव्य तीर्थ यात्रा आज भी दिमाग के प्रस्तर खंड पर एक दिवा स्वप्न की तरह अंकित है और दिन-रात प्रभु शिव की स्मृति में प्रतिदिन के प्रकटीकरण में ॐ नम : शिवाय मंत्र प्रस्फुटन जिह्वा स्वयं करती है.






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