

व्योमेश सिंह 'बैस'
इंजीनियर (इंडिगो एअरलाइंस) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कदाचित खुदीराम बोस ऐसे हुतात्मा थे, जिनके अंतिम संस्कार के उपरांत एक चुटकी भस्म को प्राप्त करने के लिए हजारों स्वाधीनता के दीवाने टूट पड़े थे. यह भस्म सोने-चांदी और हाथी दांत की डिबियों में सहेजी गई थी. खुदीराम बोस की भस्म के ताबीज बनाकर बालकों और तरुणों को पहनाया गया था ताकि क्रांतिकारियों की सेना तैयार हो सके. खुदीराम बोस क्रांति के अग्रदूत थे, जिनके पुरुषार्थ से न केवल बंगाल वरन भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध स्वाधीनता की अग्नि ज्वालाएं प्रज्वलित हुईं.
'एक बार विदाई दे मां, घूरे आसी .. हंसी हंसी पोरबो फांसी देखबे भारतवासी!' ओ मां! मुझे एक बार विदा दो तनिक घूमकर आता हूं .. हंसता हंसता फांसी के फंदे में चढ़ जाऊंगा और सारे भारतवासी देखेंगे!
महान क्रांतिकारी खुदीराम बोस की ये पंक्तियां जहां एक मार्मिक संवेदना उत्पन्न करती हैं तो दूसरी ओर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध स्वदेश के लिए सर्वस्व अर्पित करने की प्रेरणा देती हैं. सन १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम के उपरांत महारथी खुदीराम बोस ही प्रथम क्रांतिकारी थे जो सबसे कम उम्र १८ वर्ष ८ माह ८ दिन में फांसी पर चढ़ा दिए गए थे. ये वही बंगाल है, जहां से राष्ट्रवाद की भावना प्रबल हुई थी, परंतु वर्तमान परिप्रैक्ष्य में बंगाल बिखर रहा है. इसलिए स्वाधीनता के अमृत काल में महान क्रांतिकारी खुदीराम बोस के बलिदान की गाथा जन-जन तक पहुंचना ही चाहिए ताकि बंगाल अपनी विरासत को अक्षुण्ण रख सके. स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी रणबांकुरे कौन थे? वे लोग कोई और ही थे. कौन थे? जिन्हें केवल एक प्रेम, देश प्रेम था. जिन्हें केवल एक धुन राष्ट्र धुन थी और जिनका केवल एक लक्ष्य था भारत मां की स्वतंत्रता! फिर चाहे स्वयं का शरीर बेडियों में जकड़ कर कोड़ों से क्यों न उधेड़ दिया जाए, लेकिन तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें न रहें गाते हुए फांसी पर झूल जाने वाले कई नामों को हम जानते भी नहीं. जिन्हें जानते है उन्हें भी प्रकारातंर से कभी आतंकवादी, लुटेरा, डकैत और फॉसिस्ट कहा गया. इसी कड़ी में खुदीराम बोस भी आते हैं. १८ साल, ८ माह और ८ दिन की उम्र में फांसी का फंदा चूम लिया. इस उम्र में जब आज के अधिकतर नौजवान यारी-दोस्ती और मौज- मस्ती को ही जीवन का ध्येय और पर्याय समझ रहे होते हैं तब एक समय में इसी उम्र का नौजवान हाथ में गीता लेकर भारत माता की जय बोलते हुए फांसी के फंदे पर झूल गया. अंग्रेजों की दासता स्वीकार नहीं पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले में बाबू त्रैलोक्यनाथ बोस धर्मात्मा कायस्थ थे. उनकी पत्नी लक्ष्मी प्रिया देवी भी एक हाथ से धैर्य- धर्म को थामे रखती और दूसरे हाथ में स्वदेश प्रेम की डोर लिए चलतीं. यह शुभ संस्कारों का ही प्रभाव था कि ३ दिसंबर १८८९ के दिन जब बोस दंपति के घर बालक ने जन्म लिया तो उसका नाम रखा खुदीराम बोस अर्थात शुभ लक्षणों वाला यह बालक खुद्दारी की परिभाषा सार्थक करने वाला था. तो फिर वह अंग्रेजों की दासता को कैसे स्वीकार कर लेता. जैसे शुक्ल पक्ष का चंद्रमा एक-एक दिन
करके बढ़ता रहता है, यह बालक भी एक- एक वर्ष बढ़ता गया और हर उम्र के साथ उसमें देश को स्वतंत्र करा लेने की जिजीविषा बढ़ती गई. यह जिजीविषा एक दिन इतनी बढ़ी कि नौवीं कक्षा के छात्र खुदीराम बोस ने पढ़ाई छोड़ दी और स्वदेशी आंदोलन में कूद पड़े. परंतु यह केवल प्रारंभ था, बालक बोस को अभी लंबी दूरी तय करनी थी. खुदीराम बोस में क्रांतिकारी बदलाव
स्वदेशी आंदोलन जारी तो था, लेकिन बोस के विचारों में केवल इतना होना ही पर्याप्त नहीं था. यह आवश्यक था कि समग्र जनता में चेतना आए और वह घरों से निकल पड़ें और ब्रिटिश शासन को जड़ से उखाड़ फेकें. स्वदेशी आंदोलन में अनेक ऐसे ही क्रांतिकारियों का साथ बोस को मिला और मां के सपूतों का कारवां बढ़ चला. सन १९०६ में अंग्रेज सिपाही को मुक्का मारने
के साथ ही खुदीराम बोस में क्रांतिकारी बदलाव आया. मिदनापुर में एक औद्योगिक तथा कृषि प्रदर्शनी लगी हुई थी. खुदीराम ने इस प्रदर्शनी में आए लोगों को सोनार बांग्ला जिसे कि सत्येंद्रनाथ ने लिखा था. यह बेहद ज्वलंत विषय पर लिखा गया पत्रक था. एक पुलिस वाले ने उन्हें यह पत्र बांटते देखा तो पकड़ने दौडा. तेजतर्रार खुदीराम बोस ने सिपाही के मुंह पर घूंसा मार दिया और पत्रक को लेकर वहां से आसानी से भाग निकले. प्रकरण पर अभियोग चलाया गया, लेकिन गवाह न मिलने पर बोस निर्दोष छूट गए. सन १९०५ में अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन कर दिया. लॉर्ड कर्जन इसे अंजाम देने वाला था, जिसके विरोध में लोग सड़कों पर उतर आए थे. इन क्रांतिकारियों के दमन के लिए मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड को भेजा गया. किंग्सफोर्ड के दमनकारी तरीके बेहद क्रूर थे. उसने कई निर्दोषों को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया. अंग्रेजी सरकार ने इस दरिदे को बदले में सम्मान देकर मुजफ्फरपुर में सत्र न्यायाधीश बना दिया.
किंग्सफोर्ड को सजा देने के लिए आगे आए
बंगाल में क्रांतिकारियों की एक समिति युगांतर इस पूरी दमनकारी नीति से रोष में थी. बोस पहले ही इससे जुड़ चुके थे. एक गुप्त बैठक में तय हुआ कि किंग्सफोर्ड को उसके किए की सजा तो मिलनी ही चाहिए और तब दो नाम क्रमशः प्रफुल्ल कुमार चाकी और खुदीराम बोस के तय हुए. खुदीराम को एक बम और पिस्तौल दी गई. प्रफुल्ल कुमार को भी एक पिस्तौल दी गई. अब दोनों को अपना लक्ष्य साधने के लिए रवाना किया गया. किंग्सफोर्ड को भी अपने विरुद्ध हो रही इस योजना की जानकारी कहीं से मिल गई थी. दोनों ही क्रांतिकारी बेहद सतर्क थे, सबसे पहले दोनों ने किंग्सफोर्ड के बंगले की निगरानी की. बघ्धी और घोड़े की पहचान की, खुदीराम बोस तो किंग्सफोर्ड के कार्यालय तक भी हो आए थे. अगले दिन योजना के अुनसार दोनों अपनी-अपनी जगह तैनात हो गए. ३० अप्रैल १९०८ को दोनों क्रांतिकारी किंग्सफोर्ड के बंगले के बाहर जमे हुए थे. रात साढ़े आठ बजे क्लब से एक बघ्घी निकली, खुदीराम बोस उसके पीछे भागने लगे.रास्ते में अंधेरा था, उन्होंने निशाना साधकर आगे जा रही बघ्धी पर बम फेंक दिया. यह सन १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम के बाद हिंदुस्तान में किया गया पहले बम विस्फोट के तौर पर देखा जा सकता है. इतिहासकारों के अनुसार, इसकी आवाज तब तीन मील दूर तक सुनी गई और फिर कुछ दिनों बाद लंदन तक में सुनी गई. लेकिन सौभाग्य से उस दिन ग्सफोर्ड बच गया क्योंकि उसकी बघ्घी क्लब से कुछ देर बाद निकली थी.
नंगे पैर २४ मील चले
खुदीराम तथा प्रफुल्ल कुमार दोनों ही रातों- रात नंगे पैर २४ मील भागते चले गए और वैनी रेलवे स्टेशन जाकर रुके. अंग्रेज अफसर भी चुप नहीं बैठे थे. वैनी स्टेशन पर उन्हें घेर लिया गया. प्रफुल्ल कुमार चाकी ने युगांतर का कोई भेद न खुल जाए इसलिए खुद को गोली मारकर वीरगति का मुख चूमा. इधर खुदीराम बोस गिरफ्तार कर लिए गए. कई बार अंग्रेजों को छकाने वाले खुदीराम को अब अंग्रेज नहीं छोड़ने वाले थे, इसलिए ११ अगस्त १९०८ को उन्हें फांसी दे दी गई. खुदीराम बोस की वीरगति का असर भारत के नौजवानों पर ऐसा पड़ा कि बोस क्रांतिकारी वीरता के पर्याय बन गए. उनका नाम लेकर नौजवान स्वाधीनता की कसमें खाने लगे और बंगाल में लड़के खुदीराम नाम लिखी किनारी की धोती पहनने लगे थे. यह धोती स्वदेशी और स्वतंत्रता आंदोलन की पर्याय बन गई.
सबसे कम उम्र के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जिन्हें फांसी दी गई
आज जो हम तिरंगा लहरा रहे हैं और उसकी छांव के नीचे खड़े हैं, इसके भगवा रंग में वीर अमर बलिदानी खुदीराम बोस का लहू शामिल है. सन १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम में सबसे कम १३ वर्ष की उम्र में महान वीरांगना मैना बाई का बलिदान हुआ था. यद्यपि १८७२ में कूका आंदोलन में ६८ सेनानी शहीद हुए थे, जिसमें १३ वर्ष का बालक लुधियाना के डिप्टी कमिश्नर की दाढ़ी पकड़ ली थी और तब तक नहीं छोड़ी जब तक उसके हाथ नहीं काट दिए गए फिर उसका बलिदान हुआ. यह उस समय तक का सबसे कम उम्र में बलिदान था परंतु दुर्भाग्य है कि बड़े नामों के आगे इस बालक का नाम ज्ञात नहीं है जो शोध का विषय है तथापि अब १२ वर्षीय महारथी बाजी राउत का नाम सबसे कम उम्र में बलिदान देने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में दर्ज है (सन १९३८). उपरोक्तानुसार अज्ञात महारथी बालक को तोप के मुंह में बांधकर उड़ाया गया था और महारथी बाजी राऊत को गोलियों से भून दिया गया था. अतः फांसी की सजा के दृष्टिकोण से, महारथी खुदीराम बोस सबसे कम उम्र के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, जिन्हें फांसी दी गई थी. फांसी के समय खुदीराम बोस के हाथ में गीता थी और चेहरे पर विलक्षण आभा के साथ मुस्कुराहट थी. उनके अंतिम उद्गार न केवल मर्मस्पर्शी हैं, वरन मातृभूमि के लिए सर्वस्व अर्पित कर देने की पराकाष्ठा के उच्चतम मानक हैं-
'मैं बहुत गरीब हूं, मेरे पास भारत मां को देने के लिए कुछ नहीं था, सिवाए मेरे प्राणों के, जिसे आज मैं दे रहा हूं' ....
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